haryanavi joke in hindi haryanavi commedy



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(इसतैं तै मेरी एक डाक बी ना उटती) – इससे तो मेरी एक छलांग भी बर्दाश्त नहीं होती.

"न्यूं भी तै हो सकै सै"
भरपाई का आपणे खसम रळडू गैल कसूता रौळा हो-ग्या, अर रळडू घर छोड कै चल्या गया ।

जब रळडू कई दिन तक ना आया, तै भरपाई का छोरा सुन्डू आपणी मां तैं बोल्या - ए मां, मन्नैं तै इसा लागै सै कदे बाबू नै दूसरा ब्याह कर लिया हो अर कितै बाहर रहण लाग-ग्या हो"।

न्यूं सुण-कै भरपाई नै सुन्डू कै एक रहपटा मारा अर न्यूं बोल्ली - "कमीण, इतणा भूंडा बोल्या करैं, न्यूं भी तै हो सकै सै अक तेरा बाबू किसै ट्रक कै नीचै आ-ग्या हो !!"


एक बै भाई, गाम में एक आदमी मर-ग्या । उसके घर वाले उसनै अंतिम संस्कार तैं पहल्यां न्हुआवण (नहलाने) लाग-गे - उस (मुर्दे) नै कुर्सी पै बैठा कै ।

घणी हाण (देर) हो-गी न्हुवाते-न्हुवाते - सारे कत्ती दुखी हो-गे । वो (मुर्दा) कदे इस साइड में पड़-ज्या, अर कदे दूसरी साइड में पड़-ज्या !

एक भाई कत्ती दुखी हो-ग्या अर छो में आ कै बोल्या - ऐ मेरे यार, मरैं तै सब सैं, पर तू तै कत्ती-ए जी तोड़ रहया सै !!




भाई, जाट जुगाड़ी आदमी हो सै । कितै न कितै तैं सारी बातां का जुगाड़ कर लिया करै ।

एक बै एक जाट और एक बामण का छोरा एक एक ऊंट ले के जंगल में घुमण जा रे थे । जाट के छोरे वाले उँट की नकेल टूट गी । ऊंट उसने तंग करण लाग गया । वो बामण के छोरे तै बोल्या - "भाई, यो शरीर के तागा (जनेऊ ) बांध रहा यो मन्नै दे दे । यो ऊंट मन्नै दुखी कर रहया सै ।

बामण का छोआ बोलया- "ना भाई, यो जनेऊ तै म्हारा धरम सै, मैं ना दूँ ।

वे दोनूं दुखी-सुखी हो कै घरां आ-गे ।

आते ही जाट का छोरा आपणे बाबू तैं बोल्या — "बाबू, आज जंगल में इस बामण के ने मेरी गैल्यां इसा काम करा । एक तागा माँगा था, वो भी ना दिया । आगै इन तैं व्यवहार कोन्या राखणा ।

उसका बाबू बोल्या — "अरे इसका बाबू भी इसा ऐ था । तेरी बेब्बे के ब्याह आळे दिन तेरी बेब्बे बीमार हो-गी, तै मन्नैं बामण ताहीं न्यू कही के भाई, एक बै तू फेरां कै उपर आपणी छोरी नै बिठा दे एक घंटे खातर । घाल तै मैं आपणी नै दूंगा । पर भाई यो बामण मान्या नहीं ।"

छोरा बोल्या — फेर के हुआ बाबू ?

बाबू बोल्या - अरै होणा के था ? फेर एक घंटे खातर तेरी माँ फेरां पै बठानी पड़ी !!



एक बै एक ताऊ नै घेर में नळका (हैंड-पम्प) लगा राख्या था, अर एक पिलूरा पाळ राख्या था । उड़ै बहू/ छोरी पाणी भरण आया करती ।

एक बहू नई-नई आई थी - अर नई बहुवां नै गेड़े गैल नए सूट बदलण का शौक होवै ए सै ! ताऊ था असली नकल ठोकण आळा । जब भी वा बहू पाणी लेण आती, ताऊ पिलूरे कै ओड्डै (बहाने) बहू पै नकल मारता - "रै पिलूरे, आज तै जमा लाल (सूट) गाड रहया सै ... रै पिलूरे, आज तै सारा ए लीला हो रहया सै ... रै पिलूरे, आज तै तू काळा (सूट) पहर रहया सै ..."

कई दिनां में बहू की समझ में आया अक यो बूढ़ा तै तन्नैं कहै सै - अर उसनै आपणे खसम तैं कह दई एक वो बूढा तै न्यूं-न्यूं नकल मारै सै । वो छोरा सुण-कै बूढ़े धोरै आया, बोल्या - "ताऊ, तन्नैं बहूआं कानीं बात मारतीं हाण सरम ना आंदी ? तेरी उमर रह रही सै इन बातां की ?"

बूढ़ा बोल्या - "भाई, मैं तै इस पिलूरे नै कहया करता, अर जै बहू फरक मान-गी हो, तै टाळ कर दांगे ।"

आगलै दिन वा बहू फेर पाणी लेण आई, बूढ़ा बोल्या - रै पिलूरे, इसी-इसी बात के घरां बतावण की होया करैं ?"